चार सकारात्मकताओं की संस्कृति


यह पूछे जाने पर कि क्या कारण है कि स्वतन्त्रता के 72 वर्ष बाद, कुछ क्षेत्रों में स्पष्ट प्रगति के बावजूद, भारत आज भी विकासशील देशों में शामिल है, एक वयोवृद्ध सज्जन, जो भारतीय गणराज्य के प्रथम 40 वर्षों में 38 वर्ष एक अखिल भारतीय सेवा के सदस्य रह चुके हैं, का उत्तर था, "हमारा डीएनए ही गड़बड़ है." किन्तु ऐसा बिलकुल नहीं है, हम भारतीयों का डीएनए वैसा ही है जैसा अन्य देशों के निवासियों का, परंतु दोष है पिछली दो-तीन शताब्दियों में हमारे देश में पनपी और बढ़ी सामाजिक एवं कार्य संस्कृति का. कुछ सम्माननीय अपवादों को छोड़ दें तो यह संस्कृति बेईमानी, अतिशयोक्ति, स्वयं अपने को भी धोखा देने, गैर-ज़िम्मेदारी, कानून तोड़ने, अनुशासनहीनता और कार्य में अयोग्यता एवं अकुशलता की बन गई है. यदि भारत को 138 करोड़ भारतीयों की प्रतिभा एवं उनको मिल रहे अवसरों के साथ न्याय करना है तो पूरे देश में वर्तमान में व्याप्त नकारात्मक संस्कृति के स्थान पर चार सकारात्मकताओं - सत्यनिष्ठा या ईमानदारी, श्रेष्ठता, कानून का पालन, और ज़िम्मेदारी - की संस्कृति को लाना होगा. आगे, हम इन चार सकारात्मकताओं में प्रत्येक को ध्यान से देखेंगे.

#1  सत्यनिष्ठा या ईमानदारी

सत्यनिष्ठा या ईमानदारी को यहाँ एक विहंगम संकल्पना की तरह प्रयोग किया गया है जिसमें उद्देश्य की ईमानदारी, सत्यभाषण, पारदर्शिता, दृढ़निष्ठा का साहस, लेन-देन में ईमानदारी, निष्पक्षता, न्यायपरायणता, वैचारिक ईमानदारी, एक समान कथनी-करनी,  सटीकता, और, सबसे महत्त्वपूर्ण, अपने -आप से ईमानदारी, इन सब को शामिल किया गया है. कैसे सत्यनिष्ठा मात्र एक सुंदर नैतिक परिकल्पना या विचार ही नहीं है बल्कि इसकी महान व्यावहारिक उपयोगिता है और यह राष्ट्रनिर्माण के लिए नितांत आवश्यक है, यह नीचे वर्णित है. 

वैज्ञानिक सहित सभी शोध मूलतया सत्य की खोज हैं और ईमानदारी के वातावरण में ही पनपती और फलती हैं जिसमें आशाओं एवं अपेक्षाओं के सर्वथा विपरीत आए परिणामों को भी उसी तरह स्वीकारा जाता है जैसे उनके अनुरूप आए परिणामों को. यही तरीका है जिससे विज्ञान की प्रगति होती है और जिससे आविष्कार एवं नवाचार संभव होते है.

विश्वास ईमानदारी और सक्षमता की बुनियाद पर खड़ा होता है. सक्षमता चाहे वही हो परंतु अधिक ईमानदारी अधिक विश्वास का कारक बनती है और जिस समाज में परस्पर विश्वास अधिक है, उसमें लेन-देन और व्यापार की प्रक्रिया सस्ती और तेज़ होती है जिससे वह समाज शीघ्र और अधिक उन्नति कर पाता है.

स्थान '' से स्थान '' तक की यात्रा हम तब ही पूर्ण कर पाएंगे जब हम न केवल '' और '' कहाँ स्थित है इस विषय में ईमानदार होंगे बल्कि यात्रा के विभिन्न चरणों के विषय में भी. उदाहरणार्थ, यदि '' से '' की दूरी 500 किलोमीटर है लेकिन हम उसके केवल 250 किलोमीटर होने का दावा करते हैं तो ज़ाहिर है कि सही दिशा में 250 किलोमीटर चलने के बाद भी हम आधी दूरी तक ही पहुंच पाएंगे, इसी तरह 500 किलोमीटर की यात्रा में 250 किलोमीटर चलने के बाद यह घोषणा कर देते हैं कि हमारा गंतव्य '' आ गया तो वह आत्मप्रवंचना अर्थात स्वयं को धोखा देने के अतिरिक्त कुछ नहीं होगा.    

#2  श्रेष्ठता 

श्रेष्ठता अर्थात किसी वांछनीय मानसिक अथवा शारीरिक कृत्य को बेहतर से बेहतर करना, यह योग्यता से भी कहीं आगे की संकल्पना है. दरअसल, श्रेष्ठता बनाम योग्यता की बहस में हम कह सकते हैं - जहाँ आपकी योग्यता से आपके ग्राहक बने रहते हैं, वहीं आपकी श्रेष्ठता उनको आनंदित करती है. तर्क एवं गणित की भाषा में - श्रेष्ठता के लिए योग्यता होना आवश्यक है, पर्याप्त नहीं. हम अपने उद्देश्य के लिए श्रेष्ठता में इन सब को सम्मिलित करेंगे - समय की पाबन्दी (जी हाँ, आरंभ इसी से होता है), उच्च गुणवत्ता, सदैव सीखने की इच्छा एवं सामर्थ्य, निरंतर सुधार, विचार कर पहली बार में ही कार्य ठीक प्रकार से करना, नई ऊँचाइयाँ छूने के लिए दूसरों को चुनौती देना और उनकी ऐसी चुनौती स्वीकार करना, किसी क्षेत्र की सर्वश्रेष्ठ कार्यपद्धति को आधार बना कर आगे की कार्यपद्धति का आविष्कार, सफलता को आदत बना कर उससे भी आगे बढ़ना.  श्रेष्ठता अपने आप में एक पुरस्कार है, यह हममें वास्तविक उपलब्धि का भाव जगाती है जिससे और बड़ी सफलताएँ प्राप्त करने के लिए प्रयास करने की आन्तरिक प्रेरणा मिलती है.  
 हम सब वर्षों तक शैक्षिक संस्थाओं से विद्यार्थी के रूप में जुड़े रहे हैं और हम में कई सौभाग्यशाली रहे हैं कि हमें ऐसे कुछ अध्यापक मिले जो अपने विषय पढ़ाने में प्रवीण तो थे ही, साथ ही उन्होने हमारा हमारी जिज्ञासा की प्रवृत्ति और आश्चर्य के भाव से परिचय कराया और उन्हें और दृढ़ता दी, यही नहीं, उन्होने हमें ज्ञानार्जन की लम्बी यात्रा आरम्भ करने के लिए प्रेरित किया. वे श्रेष्ठ अध्यापक थे! 

#3  कानून का पालन

कानून का पालन करने वाले समाज में, जिसमें कानून का शासन होता है, 20वीं शताब्दी में ब्रिटेन के ख्यातिलब्ध न्यायाधीश लॉर्ड डेनिंग का अमर कथन "तुम चाहे कितने भी ऊँचे हो, क़ानून तुमसे ऊपर है" सर्वमान्य होता है. उस समाज में आप यह नहीं कह सकते कि फ़लां क़ानून असुविधाजनक है या कठोर है अतः हम उसे नहीं मानेंगे; जब तक कोई भी क़ानून लागू है उसे मानना होगा. हाँ, अनावश्यक और असामयिक हो चुके क़ानूनों को एक विधिसंगत तरीके से संशोधित किया जा सकता है, पूरी तरह हटाया भी जा सकता है.    

यह मान्यता बिलकुल गलत है कि क़ानून हमें ज़ंजीरों से बांध देता है. दरअसल, क़ानून का निष्ठा से पालन हमारी प्रतिभा और रचनात्मकता को आज़ाद कर देता है. कला एवं विज्ञान के क्षेत्रों में अधिकांश रचनात्मक कार्य उन देशों में हुआ है और हो रहा है जहाँ समान्यतया लोग क़ानून का पालन करते हैं.
हमारे बहुत-से साधारण माने जाने वाले युवा भी पश्चिम के देशों, ऑस्ट्रेलिया, जापान या सिंगापुर में, जो काफ़ी हद तक क़ानून का पालन करने वाले समाज हैं, सफलता की ऊंचाइयों को छू लेते हैं.

#4  उत्तरदायित्त्व या ज़िम्मेदारी

यहाँ हम उस ज़िम्मेदारी की बात कर रहे हैं जो कर्तव्य की पुकार से ऊपर और आगे, स्वतंत्र रूप से अपनी पहल पर, दूसरों के लिए कुछ करने का नाम है. ऐसी ज़िम्मेदारी तब ही सम्भव है जब अपनत्त्व का भाव हो, क्योंकि जिम्मेदार महसूस करना स्वैच्छिक है, ज़िम्मेदारी उसी की होती है जो उसे स्वयं लेता है. कोई भी अन्य आपको ज़िम्मेदार नहीं बना सकता, हाँ, आपके किए या न लिए के लिए आपकी जवाबदेही तय कर सकता है.      

अपने मित्रों की ज़िम्मेदारी लेने वाले उनकी हमेशा सही रास्ते पर चलने में सहायता करते हैं, पर्यावरण के लिए अपने को ज़िम्मेदार मानने वाले अपने चारों तरफ़ सफ़ाई रखते हैं, वायु प्रदूषण के प्रति सजग रहते हैं, जल के दुरुपयोग और बरबादी को रोकते हैं, और पहले तो वस्तुओं का कम इस्तेमाल करते है, इस्तेमाल करना ही हो तो पुरानी वस्तुओं का बार-बार करते हैं, और उनके उस काम का न रहने पर कुछ परिवर्तित कर किसी और काम के लिए इस्तेमाल करते है. एक अकेला व्यक्ति या एक छोटा समूह भी पूरे समाज, यहाँ तक कि पूरे देश के लिए अपने को ज़िम्मेदार समझ सकता है.     

हमारी अपनी वास्तविक उन्नति के लिए यह आवश्यक है कि हम अपने जीवन की ज़िम्मेदारी स्वयं लें, ऐसे में हम मानेंगे और पाएंगे कि हमारी सफलताओं-असफलताओं के बीज हमारी अपनी सोच और किए कार्यों में ही होते है.     


देश में बहुतों की रचनात्मकता जो अभी किसी भी उल्टे-सीधे रास्ते से शीघ्र अनधिकार सफलता एवं समृद्धि पाने में लगी है, कल्पना कीजिए यदि उसे ईमानदारी और क़ानून का पालन आज़ाद कर दे तो वह रचनात्मकता एक सकारात्मक बल का रूप ले लेगी. श्रेष्ठता इस सकारात्मक बल को अधिक-से-अधिक शक्तिशाली बनाएगी और ज़िम्मेदारी उसे राष्ट्रनिर्माण के पवित्र कार्य में लगाएगी. यदि ऐसा, जो कि बिलकुल सम्भव है, हुआ तो कोई भी भारत को हमारे-आपके सपनों का भारत बनने से नहीं रोक सकेगा.

Comments

  1. Now people have to be practical outside theoretical. If we follow all these four things, then the country will start walking on the path of development very quickly.

    ReplyDelete
    Replies
    1. धन्यवाद! आपकी तरह के व्यक्ति स्वयं चार सकारात्मकताओं की संस्कृति को अपना कर औरों को इसके लिए प्रेरित का सकते हैं. 

      Delete
  2. Impressed. If we follow these four things, then the country will start running on the path of development very quickly.

    ReplyDelete
  3. २०१४ के पूर्व भारत वर्ष अनेक अनिश्चताऔ से घिरा हुवा था नरेन्द्र भाई मोदी के नेतार्त्व मे रास्त्र को एक दिशा मिली /विलक्षण प्रतिभा के धनी मोदीजी ने एक दूरदर्शी राष्ट्ररनायक के रूप मे १३५ करोड़ देशवासियों को धर्मविहीन जातिविहीन मानसिकता से विकास के अनेक आयाम दिलाये आज वो संपूर्ण राष्ट्र के लिए प्रगति की मूर्त बन चुके है जनता के द्वारा ठुकराने पर प्रतिपक्ष इतालियन मूल की प्रतिपक्ष नेता के नेतृत्व मे दिशाहीन मार्ग पर चल पड़ा व् अप्रासंगिक शैली मे झूट का सहारा लेकर राष्ट्र-अहितकारी कार्यो मे लिप्त हो गया.किसान आन्दोलन सुनियोजित मोदी विरोधी,मोदी हटाओ कुटिल प्रयास है विश्व के mediaसे मेरी गुजारिश है स्वयं सत्य का आंकलन कर खबर प्रेषित करे. TIME का पूर्व पाठक आवांज देता हु की इस का बहिस्कार करे

    ReplyDelete

Post a Comment

Popular posts from this blog

The Culture of Five Positives

पाँच सकारात्मकताओं की संस्कृति

Let India's brightest youth find technological solutions to its problems